Lyrics
धी-धी... धिम तननन...
धी-धी... धिम तननन...
धी-धी... धिम तननन...
धिम... तननन...
(श्लोक)
एकदंताय… वक्रतुंडाय… गणाधिपति प्रथमेशा।
विघ्नहर्ताय… बुद्धि दाताय… सिद्धि विनायक गणेशा।
(मुखड़ा)
शिव गौरी के प्रिय गजानन तुम हो जग में सबसे महान।
कोई कथा ऐसी नहीं, जो कर दे पूर्ण तेरा बखान॥
एकदंताय… वक्रतुंडाय… गणाधिपति प्रथमेशा।
विघ्नहर्ताय… बुद्धि दाताय… सिद्धि विनायक गणेशा।
[अंतरा 1]
जब देवों में प्रश्न उठा ये, कौन जगत में सबसे महान?
दौड़े सब ब्रह्मांड नापने, लेकर अपने-अपने विमान।
अंबर से कार्तिकेय निकले, मन में ये विश्वास लिए,
पर गजानन स्थिर बैठे, चित्त में गहरा ज्ञान लिए।
शिव-शक्ति के चरणों में ही, अपना सारा लोक लिया,
माता-पिता की सात प्रदक्षिणा, भक्ति से अभिषेक किया।
माता-पिता ही सृष्टि सारी, यही सत्य जग को जाना,
ज्ञान-शिखर पर बैठे स्वामी, सबने है तुमको माना॥
एकदंताय… वक्रतुंडाय… गणाधिपति प्रथमेशा।
विघ्नहर्ताय… बुद्धि दाताय… सिद्धि विनायक गणेशा।
[अंतरा 2]
हर शुभ कार्य के द्वार पे देवा, नाम तुम्हारा गाया जाए,
बिना तुम्हारी वंदना के, सफल काज ना हो पाए।
"मंगल काज हो, उत्सव हो, या हो कोई नया विधान,"
सबसे पहले होता स्वामी, गणपति बप्पा का आह्वान।
प्रथम पूज्य का वर पाकर तुम, संकट सारे हरते हो,
अंधियारे जीवन में आकर, खुशियों का रंग भरते हो।
विद्या-बुद्धि के तुम सागर, तुम ही सदिच्छा के दाता,
भक्तों के इस भवसागर में, तुम ही सच्चे भाग्य विधाता॥
एकदंताय… वक्रतुंडाय… गणाधिपति प्रथमेशा।
विघ्नहर्ताय… बुद्धि दाताय… सिद्धि विनायक गणेशा।
शिव गौरी के प्रिय गजानन तुम हो जग में सबसे महान।
कोई कथा ऐसी नहीं, जो कर दे पूर्ण तेरा बखान॥
एकदंताय… वक्रतुंडाय… गणाधिपति प्रथमेशा।
विघ्नहर्ताय… बुद्धि दाताय… सिद्धि विनायक गणेशा।
धी-धी... धिम तननन...
धी-धी... धिम तननन...
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Last Updated
May 07, 2026